रविवार, 19 सितंबर 2021

कोर्ट मैरिज के लिए 30 दिन का नोटिस प्रकाशित करना जरूरी नही है

 कोर्ट मैरिज के लिए 30 दिन का नोटिस प्रकाशित करना जरूरी नही है

@1

               घर पर नोटिस भेजना क्यों जरूरी इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला



        भारत में अभी कोर्ट मैरिज को या कोर्ट मैरिज करने वालों को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता । और इसका सबसे बड़ा कारण है भारत में लोगों की यह मान्यता की कोर्ट मैरिज सिर्फ वही लोग करते हैं जो घर से भागते हैं या फिर जिनकी मैरिज इंटर कास्ट होती है ।
ऐसे में इलाहाबाद हाई कोर्ट का जजमेंट और भी अहम हो जाता है जिस में फैसला सुनाते हुए यह माना कि स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 की धारा 6 के तहत नोटिस पब्लिश करना और धारा 7 के तहत उस शादी पर किसी तरह की आपत्ति को आमंत्रित करना निजता के अधिकार का उल्लंघन होता है ।

@2

        दोस्तों होता यूं है कि जब कोई कोर्ट मैरिज के लिए आवेदन करता है तो कोर्ट मैरिज के लिए 30 दिन का समय दिया जाता है । इस बीच रजिस्ट्रार के ऑफिस के बाहर एक नोटिस पब्लिश करके लगा दिया जाता है । जिसमें अगर किसी को उन दोनों की मैरिज से कोई भी प्रॉब्लम हो तो वह अपनी आपत्ति को जाहिर करके शादी को रुकवा सकता है ।

@3

                कोर्ट ने कहा कि,इस तरह के नोटिस की कोई जरूरत नहीं होती ।क्योंकि यह व्यक्ति के स्वतंत्रता और निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करते हैं । उन्हें पूरी तरह से खत्म करते हैं । कोर्ट ने कहा कि स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 की धारा 5 के तहत शादी करने वाला जोड़ा लिखित रूप में विवाह अधिकारी को यह बताएंगे कि इस तरह का नोटिस लगाना चाहिए या फिर नहीं । अगर दोनों पक्ष ऐसा नोटिस लगाने से मना करते हैं तो अधिकारी इस तरह के नोटिस को प्रकाशित नहीं करेगा और आगे की प्रोसीजर को फॉलो करेगा ।
@4

              लेकिन अधिकारी को यह अधिकार है कि वह दोनों पक्षों की जांच पड़ताल करें जैसे – उनकी पहचान करना, उम्र का पता करना, लीगल सहमति है या नहीं जैसी बातों से पूरी तरह से संतुष्ट ना होने पर उनमें प्रमाण पत्रों की मांग भी कर सकता है ।

@5

      क्या था मामला

            कोर्ट मे एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई थी । आरोप था कि एक लड़की अपने प्रेमी से शादी करने जा रही थी । इस वजह से उसे हिरासत में लिया गया है । दोनों अलग धर्मों से संबंधित हैं । उन्होंने कोर्ट के सामने यह कहा कि स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 के तहत वह शादी करना चाहते हैं । 

पर         30 दिन के नोटिस की वजह से उनकी शादी में बहुत सारे लोग आपत्ति जाहिर करेंगे । जिसकी वजह से उनकी शादी रुक जाएगी ।

@6

       उन्होंने कहा कि इस तरह का नोटिस निजता के अधिकार का उल्लंघन है । इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए की कोर्ट में इस तरह का फैसला सुनाया और कहा कि किसी भी व्यक्तिगत कानून के तहत इस तरह के विवाह के लिए किसी भी तरह के नोटिस को प्रकाशन या आपत्ति को आमंत्रित करने की बिल्कुल जरूरत नहीं होती ।

@7

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#9

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6}हिंदू उत्तराध‌िकार अध‌िनियम से पहले और बाद में हिंदू का वसीयत करने का अध‌िकार

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#10

शनिवार, 18 सितंबर 2021

प्रतिकूल कब्जे की संपत्ति को कैसे बचाएँ?

 

प्रतिकूल कब्जे की संपत्ति को कैसे बचाएँ?

@1 

                 किसी भी संपत्ति पर आप का कब्जा बिना किसी दस्तावेज के है और आप 
      निजी संपत्ति पर 12 वर्ष और सरकारी संपत्ति पर 30 वर्ष से अधिक समय से 
काबिज हैं तो आप का उस संपत्ति पर कब्जा प्रतिकूल हो चुका है और आप से 
ऐसी संपत्ति का कब्जा कानूनी रूप से नहीं ले सकता है। जब तक आप के 
विरुद्ध वह संपत्ति खाली करने की अदालत की कोई डिक्री न हो और उस के 
निष्पादन में जब क सरकारी मशीनरी (नाजिर और पुलिस) खुद उसे खाली 
कराने न आए तब तक उस स्थान को छोड़ने की कोई जरूरत नहीं है।
 

@2 ----------------------------------------------------------------------------------------------------------------
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                     आपके विरुद्ध कोई कानूनी कार्यवाही उस स्थान का कब्जा प्राप्त करने के लिए 
की जाती है तो आप को अदालत से समन या नोटिस मिलेगा और अदालत में 
आप अपना पक्ष रख सकते हैं कि आप उस संपत्ति पर विगत 60 वर्ष से 
काबिज हैं और आप को वहाँ से हटाया नहीं जा सकता है। बस आप को यह 
करना होगा कि विगत 30 वर्ष से आप के उस जमीन पर कब्जे के सबूत देने 
होंगे जो नल, बिजली के बिलों, राशनकार्ड, वोटर लिस्ट आदि हो सकते हैं। 
ऐसा सबूत होने के कारण आप को वहाँ से बेदखल नहीं किया जा सकेगा।
@3 
               आप खुद यह दावा दीवानी न्यायालय में आपको हटाने की कोशिश करने वालों 
के विरुद्ध पेश कर सकते हैं कि आप का उस संपत्ति पर 60 वर्ष से कब्जा है 
और विपक्षी उसे गैर कानूनी तरीकों से हटाना चाहते हैं। इस कारण उन के 
विरुद्ध इस आशय की स्थायी निषेधाज्ञा की डिक्री पारित की जाए कि वे आप 
को कानूनी तरीके के सिवा अन्य तरीके से न हटाएँ, इसी दावे में आप 
विपक्षीगण के विरुद्ध तुरन्त ही अस्थायी निषेधाज्ञा प्राप्त करने के लिए आवेदन 
भी प्रस्तुत कर सकते हैं।

@4

आपराधिक मामले की जांच के दौरान पुलिस किसी अचल संपत्ति 

को जब्त नहीं कर सकती:

पुश्तैनी संपत्ति और हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम

रविवार, 5 सितंबर 2021

पुश्तैनी संपत्ति और हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम

 

पुश्तैनी संपत्ति और हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम

 

 @1               यदि किसी पुरुष को अपने पिता से कोई संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त होती है तो वह पैतृक संपत्ति है, क्या?। इस में पौत्रों व परपौत्रों का भी हिस्सा होता 
है,क्या?। दादा जी का देहान्त २००१ में हुआ। पिता जी की कोई बहन या बहनें नहीं हैं। दादा जी ने इसे स्वयं अर्जित किया था।
परंपरागत हिन्दू विधि में यह सिद्धान्त था कि यदि किसी पुरुष को अपने पिता,  दादा या परदादा से उत्तराधिकार में संपत्ति प्राप्त हो तो वह उस की स्वयं की संपत्ति नहीं होगी अपितु एक पुश्तैनी जायदाद होगी। जिस में उस के चार पीढ़ी तक के वंशजों का समान हिस्सा होगा। ऐसी संपत्ति सहदायिक संपत्ति कही जाती है।
@2                   लेकिन 17 जून 1956 को हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के प्रभावी होते ही यह स्थिति परिवर्तित हो गई। इस अधिनियम की धारा 8 में प्रावधान किया गया कि किसी पुरुष की संपत्ति का उत्तराधिकार किसे प्राप्त होगा। अब पुत्रों,  पुत्रियों, पत्नी और माता को पुरुष की संपत्ति में समान हिस्सा उत्तराधिकार में प्राप्त होता है। जो हिस्सा जिसे प्राप्त होता है उस पर उसी का अधिकार होता है 
 @3                        उस के पुरुष वंशजों का उस में कोई हिस्सा नहीं होता। इस अधिनियम में यह व्यवस्था की गई थी कि जो संपत्ति इस अधिनियम के प्रभावी होने के पूर्व उत्तराधिकार में प्राप्त हो कर सहदायिक हो चुकी है उस का उत्तराधिकार परंपरागत रूप से ही होगा। एक बार सहदायिक हो जाने पर संपत्ति में चार पीढ़ी तक के पुरुष वंशजों को समान अधिकार होता है। यदि उस संपत्ति के सहदायिकों में से किसी एक का देहान्त हो जाता है तो संपत्ति के 
सभी सहदायिकों का अंश बढ़ जाता है क्यों की मृत व्यक्ति के हिस्से का अधिकार सभी सहदायिकों को प्राप्त हो जाता है। इसी तरह से जब किसी सहदायिक की पुरुष संतान जन्म लेती है तो उसे जन्म से ही सहदायिक संपत्ति में अंश प्राप्त हो जाता है और सभी सहदायिकों का अंश कम हो जाता है। इस तरह सहदायिक संपत्ति का उत्तराधिकार उत्तरजीविता के आधार पर निर्धारित 
होता है।

@4

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1}गिफ्ट(Gift) की गई संपत्ति के स्वामित्व के लिए स्टाम्प ड्यूटी के भुगतान का महत्व?

2}Stay Order का क्या मतलब होता है? प्रॉपर्टी पर स्थगन आदेश क्या होता हैं? प्रॉपर्टी के निर्माण पर स्थगन आदेश कैसे होता है?

3}क्यों जरूरी है नॉमिनी? जानें इसे बनाने के नियम और अधिकार

4}Deaf and Dumb पीड़िता के बयान कैसे दर्ज होना चाहिए। Bombay High Court

#9

5}क्या दूसरी पत्नी को पति की संपत्ति में अधिकार है?

6}हिंदू उत्तराध‌िकार अध‌िनियम से पहले और बाद में हिंदू का वसीयत करने का अध‌िकार

7}निःशुल्क कानूनी सहायता-

8}संपत्ति का Gift "उपहार" क्या होता है? एक वैध Gift Deed के लिए क्या आवश्यक होता है?

#10

                लेकिन हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के प्रभावी होने से स्थिति परिवर्तित हो गई। 17 जून 1956 से पूर्व जो संपत्ति किसी को चार पीढ़ी तक के किसी पुरुष पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है तो वह सहदायिक संपत्ति रह गई और उसका उत्तराधिकार सहदायिक संपत्ति की तरह होने लगा। लेकिन यदि कोई संपत्ति किसी पुरुष पूर्वज को उक्त तिथि के बाद उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है तो वह सहदायिक संपत्ति न हुई और उस पर उस के जीवनकाल में उसी 
     @5

           उत्तराधिकारी का अधिकार होने लगा जिसे वह प्राप्त हुई है। वह उसे किसी भी रूप में हस्तांतरित भी कर सकता है।
आप के दादा जी का देहान्त 2001 में हुआ है। उन की सम्पत्ति उन की 
स्वअर्जित संपत्ति है। इस कारण उन से उत्तराधिकार में जिस को जो संपत्ति प्राप्त हुई है वह सहदायिक संपत्ति नहीं है। उस संपत्ति पर केवल उत्तराधिकारियों का ही अधिकार है। यदि दादा जी को कोई संपत्ति 17 जून  1956 के पूर्व उन के पुरुष पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी तो वह सहदायिक संपत्ति होगी और उस में दादा जी के चार पीढ़ी तक के पुरुष वंशजों का अधिकार होगा।

@6



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