गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

जानिए अपनी संपत्ति को अवैध कब्जे से वापस प्राप्त करने के उपाय

घर ,जमीन ,संपत्ति पर कभी नहीं होगा कब्जा,


जमीन से जुड़े इन नियमों को अभी जान ले, पूरा करें

 



आम तौर पर अवैध कब्जे दो तरीकों से किया जा सकता है
    #1
       जब कुछ लोग गलत दस्तावेजों को दिखाकर और ज़बरदस्ती (बल का प्रयोग) करके किसी संपत्ति पर कब्जा कर लेते हैं। जब वो लोग इस कार्य को करना शुरू करते हैं, तब से यह कार्य गैरकानूनी हो जाता है। 
ऐसा अवैध कब्जा तब भी हो सकता है, जब कोई किरायेदार आपके परिसर को खाली करने से इनकार करता है। किरायेदारों द्वारा उपयोग की जाने वाली सबसे आम बचाव प्रतिकूल कब्जे का होता है। यह सलाह दी जाती है, कि अपने आवास को किराए पर देने से पहले एक उचित किराया समझौता करें और साथ ही ऐसी स्थितियों में शामिल होने से बचने के लिए मजबूत उपाय करें। ये स्थितियां ज्यादातर तब उत्पन्न होती हैं, जब गैरकानूनी रूप से कब्जे वाले संपत्तियों को लापरवाह, किरायेदारों द्वारा अनिर्दिष्ट स्थिति के साथ असुरक्षित छोड़ दिया जाता है, या ऐसी संपत्ति जो बर्षों से पड़ी हुई हैं, जो सीधे ऐसे कुख्यात लोगों के लिए एक आसान लक्ष्य बन जाते हैं।



#2                  प्रतिकूल कब्ज़ा तब होता है, जब संपत्ति का सही मालिक अपनी संपत्ति से एक वैधानिक समय अवधि (भारतीय कानून के तहत 12 वर्ष) के भीतर एक अतिचार / कब्जा से छुटकारा पाने के लिए अपनी ओर से निष्क्रियता के परिणामस्वरूप अपने स्वामित्व के अधिकारों से वंचित हो जाता है। अतिचार / कब्जे को हटाने के लिए वैधानिक सीमा की अवधि पूरी होने के बाद, सही मालिक को अपनी संपत्ति पर कब्जा वापस पाने के लिए किसी भी कानूनी कार्यवाही शुरू करने से प्रतिबंधित किया जाता है, और इस प्रकार, विपत्तिकर्ता को प्रतिकूल संपत्ति द्वारा उस संपत्ति का शीर्षक हासिल करने की अनुमति देता है।
अप्रवासी भारतीयों के पास अवैध कब्जे, अतिचार के मामले सबसे आम हो सकते हैं। इसके कारण हैं-
    वे इन संपत्तियों में नहीं रहते हैं, हर समय संपत्ति पर कब्जा नहीं करते हैं।
    एन. आर. आई. लोग बार - बार संपत्ति को देखने नहीं आ सकते हैं, इसलिए वे दोस्तों, परिचितों और रिश्तेदारों को संपत्ति का कब्जा / नियंत्रण देना समाप्त कर देते हैं।
  #3

            इसके अलावा, समय के साथ कई रहने वालों, रिश्तेदारों, दोस्तों को लगता है कि वे खुद की जगह हैं, क्योंकि संपत्ति की निगरानी और पर्यवेक्षण करने वाला कोई नहीं है।
    
किरायेदारों / देखभालकर्ताओं के साथ मौखिक और अपंजीकृत समझौते अवैध कब्जे के परिणामस्वरूप काफी सामान्य हैं।
    ऐसी संपत्ति जिसमें किरायेदार या रखरखाव करने वाले नहीं होते हैं, और संपत्ति का मालिक भी बहुत कम ही संपत्ति को देखने आ पाता है, तो ऐसी स्तिथि में उस संपत्ति पर भू - माफिया लोग अतिचार और अवैध रूप से कब्जा बहुत आसानी से कर सकते हैं।
#4

कब्जे का वास्तविक अर्थ
               कब्जे का अर्थ है, किसी वस्तु पर वास्तविक नियंत्रण होना, चाहे आप इसके मालिक हों या न हों। हालांकि, यहां तक ​​कि वस्तु के कब्जे वाले व्यक्ति को तीसरे पक्ष के खिलाफ कुछ कानूनी संरक्षण भी प्राप्त होता है, भले ही वह उस संपत्ति का मालिक न हो। यह संरक्षण किसी भी गैरकानूनी कार्य करने वाले व्यक्ति के कब्जे में हिंसा के खिलाफ दिया जाता है।
यदि किसी संपत्ति का मालिक एन. आर. आई. होता है, जो कि बर्षों तक उस संपत्ति को देखने भी नहीं आता है, और विदेश से ही उस संपत्ति पर अपने मालिकाना अधिकारों को प्राप्त करता रहता है, तो ऐसी संपत्ति पर किसी व्यक्ति को फर्जी कब्ज़ा करने और उस संपत्ति के जाली दस्तावेजों को बनवाने में अधिक समय नहीं लगता है। इसके अलावा जैसा कि पहले भी उल्लेख किया गया है, ऐसी स्तिथि में उस फर्जी व्यक्ति को संपत्ति से निष्कासित करना बहुत मुश्किल हो जाता है।
#5

आप अपनी संपत्ति को अवैध कब्जे से कैसे बचा सकते हैं?
              कानूनी रूप से अपनी संपत्ति को नियंत्रित करने और कब्जे को बहाल करने का सबसे अच्छा तरीका न्यायालय में जाकर न्याय की मांग करना है। नागरिक न्यायालय के उपाय आसानी से उपलब्ध हैं, जहां न्यायालय में आवश्यक व्यक्तिगत उपस्थिति को सक्षम और चुने हुए वकीलों द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है। कानूनी कब्जे कानून के तहत संपत्ति के कब्जे को बहाल करने और यहां तक ​​कि शांतिपूर्ण कब्जे के साथ किसी भी तीसरे पक्ष के अतिचार या अवैध हस्तक्षेप से बचाने के लिए उपलब्ध होते हैं।
रोकथाम इलाज से बेहतर होती है
#6           आपको सच्चे केयरटेकर को अपनी संपत्ति देनी चाहिए और क़ानूनी तरीके से किरायेदारी के एग्रीमेंट को तैयार करना चाहिए। सरल शब्दों में, आपको हमेशा संपत्ति के कब्जे देने वाले व्यक्ति की स्थिति और कर्तव्य को परिभाषित करना चाहिए।
आपको किसी भी व्यक्ति को अपने घर पर लंबे समय तक कब्जा नहीं रखने देना चाहिए। आपको अवैध रूप से कब्ज़ा की हुई संपत्ति से बचने के लिए उसके केयरटेकर को बदलते रहना चाहिए।
 वास्तविक कानूनी उपाय
#7        विशिष्ट राहत अधिनियम की धारा - 5 के तहत, कोई व्यक्ति जो अपनी संपत्ति के शीर्षक से वंचित है, उसे शीर्षक से कब्जा मिल सकता है।
विशिष्ट राहत अधिनियम की धारा - 6 के तहत, एक व्यक्ति जो पूर्व में अपनी संपत्ति पर कब्जा करके और बाद में अवैध फैलाव साबित करके अपना अधिकार प्राप्त कर सकता है।
आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा - 145 उस प्रक्रिया को रद्द कर देती है, जहां जमीन को लेकर विवाद होने की संभावना है।
#8            एक व्यक्ति जिसे अपनी संपत्ति पर अतिचार या अवैध फैलाव का डर होता है, वह पुलिस के पास अपनी लिखित शिकायत दर्ज करा सकता है।
जिले के पुलिस अधीक्षक (एस. पी.) को एक लिखित शिकायत भेजी जा सकती है, जहां संपत्ति पंजीकृत डाक के माध्यम से या संबंधित पुलिस स्टेशन के अधिकार क्षेत्र में स्थित है।
यदि पुलिस अधीक्षक शिकायत को स्वीकार करने में विफल रहता है, तो संबंधित न्यायालय में एक व्यक्तिगत शिकायत एक वकील के माध्यम से दायर की जा सकती है, और मामला तब एक विशेष पावर ऑफ अटॉर्नी के माध्यम से पालन किया जा सकता है, जब मालिक न्यायालय में अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कर सकता।
#9

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हिन्दू पुरुष की मृत्यु के बाद उसकी सम्पत्ति संयुक्त परिवार की सम्पत्ति नहीं रह जाती

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एक सक्षम वकील ऐसे मामलों में क्या कर सकता है?
एक वकील अदालत में पूर्ण समर्थन, क्षमता और दक्षता प्रदान कर सकता है, और साथ ही ऐसे सभी मामलों का सामना करने के लिए कानूनी प्रतिनिधित्व में स्पष्टता प्रदान कर सकता है। देश भर में ऐसे समर्पित और सक्षम वकीलों की एक बड़ी संख्या एन. आर. आई. के मामले में भी ऐसे मामलों को संभालने के लिए उपलब्ध हैं, जो शारीरिक रूप से न्यायालय में उपस्थित होने के लिए उपलब्ध नहीं हो सकते हैं।
                        THANK YOU
#10

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#11

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#12 



                              

                               

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

हिन्दू पुरुष की मृत्यु के बाद उसकी सम्पत्ति संयुक्त परिवार की सम्पत्ति नहीं रह जाती

 हिन्दू पुरुष की मृत्यु के बाद उसकी सम्पत्ति संयुक्त परिवार की सम्पत्ति नहीं रह जाती

  #1           सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया फैसले में हिन्दू उत्तराधिकार कानून 1956 (Hindu Succession Act 1956) के तहत उत्तराधिकार के सिद्धांतों पर विचार किया है।
            हिन्दू पुरुष की मौत के बाद उसकी सम्पत्ति संयुक्त परिवार की सम्पत्ति नहीं रह जाती-After the death of a Hindu man, his property does not remain the property of the joint family



Hindu Succession Act 1956:- 

  #2              अधिनियम की धारा छह और आठ (Hindu Succession Act 1956 section 8 or 6) का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि हिन्दू पुरुष की मौत के बाद उसकी सम्पत्ति का खयाली बंटवारा (नोशनल पार्टिशन) होगा और यह उसके कानूनी वारिस को उसके अपेक्षित हिस्से के तौर पर हस्तांतरित (Transfer) होगा। इसलिए, इस तरह की सपत्ति ऐसे बंटवारे के बाद ‘संयुक्त परिवार (Joint Family) की सम्पत्ति’ नहीं रह जायेगी। ये वारिस संबंधित सम्पत्ति के ‘टिनेंट्स-इन-कॉमन’ के सदृश होंगे तथा तब तक संयुक्त कब्जा रखेंगे, जब तक इकरार विलेख के तहत उनकी संबंधित हिस्सेदारी की हदबंदी नहीं कर दी जाती।
                 न्यायमूर्ति ने ‘एम अरुमुगम बनाम अम्मानियम्मल एवं अन्य’ के मामले में यह फैसला सुनाया। पृष्ठभूमि इस मामले के दोनों पक्षकार मूला गौंदर नामक व्यक्ति के बच्चे थे। मूला गौंदर की मृत्यु 1971 में हो गयी थी। मृतक के परिवार में उसकी विधवा, दो बेटे और तीन बेटियां थीं। मृत्यु से पहले मृतक ने कोई वसीयत नहीं की थी। वर्ष 1989 में मृतक की सबसे छोटी बेटी ने बंटवारे के लिए एक मुकदमा दायर किया था।
#3

                  मृतक के पुत्रों ने यह कहते हुए मुकदमे का विरोध किया था कि उनकी मां और बहनों ने संपत्ति पर अधिकार छोड़ने का विलेख (रिलीज डीड) तैयार किया था और उनके लिए अपनी सम्पत्ति छोड़ देने की घोषणा की थी। यह भी दलील दी गयी थी कि मां ने तब वादी (बहन) की संरक्षक (गार्जियन) की भूमिका निभाई थी, क्योंकि तब वादी नाबालिग थी। उसके बाद दोनों बेटों के बीच बंटवारा विलेख तैयार किया गया था जिस पर गवाह के तौर पर हस्ताक्षर करने वालों में वादी (बहन) का पति भी शामिल था।
#4             वादी ने उसके बाद याचिका दायर की थी तथा यह कहते हुए रिलीज डीड को शुरुआती तौर पर ही अवैध करार देने की मांग की थी कि उसकी मां संरक्षक के तौर पर उसकी हिस्सेदारी का अधिकार छोड़ने के लिए अधिकृत नहीं थी। ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए मुकदमा खारिज कर दिया था कि वादी को वयस्क होने के तीन साल के भीतर ही ‘रिलीज डीड’ को चुनौती देनी चाहिए थी।
Hindu Succession Act 1956 पर हाईकोर्ट ने वादी की अपील पर ट्रायल कोर्ट के आदेश को निम्न तथ्यों के आधार पर निरस्त कर दिया था:-
1. मूला गौंदर की मौत के बाद भी कानूनी वारिसों के हाथों में यह सम्पत्ति ‘संयुक्त परिवार की सम्पत्ति’ बनी रही थी।
2. चूंकि यह संयुक्त परिवार की सम्पत्ति थी, मां संरक्षक के तौर पर नाबालिग वादी का हिस्सा नहीं छोड़ सकती।
3. इसलिए संबंधित ‘रिलीज डीड’ शुरुआती तौर पर ही अवैध था। हाईकोर्ट ने बहन के पक्ष में फैसला सुनाया था, जिसके बाद वादी के भाइयों में से एक ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
#5

सुप्रीम कोर्ट का फैसला – सुप्रीम कोर्ट ने हिन्दू उत्तराधिकार कानून 1956 (Hindu Succession Act 1956) की धारा 6 और 8 का उल्लेख करते हुए टिप्पणी की थी–
1. श्रेणी-एक (Category-I ) की महिला वारिस वाले हिन्दू पुरुष की मौत जब होती है तो संयुक्त मालिकाना वाली सम्पत्ति में उसका हिस्सा उत्तराधिकार के जरिये हस्तांतरित होता है, न कि उत्तरजीविता के आधार पर।
2. ऐसी संपत्ति का खयाली बंटवारा होता है और वारिस उस सम्पत्ति का “टेनेंट्स – इन- कॉमन” होता है।
3. उक्त सम्पत्ति तब संयुक्त परिवार की सम्पत्ति के रूप में नहीं रह जाती। इन सिद्धांतों एवम् पूर्व के निर्णयों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा:- “यह साफ है कि मूला गौंदर की मृत्यु के बाद संयुक्त मालिकाना वाली सम्पत्ति में उसकी हिस्सेदारी Hindu Succession Act 1956 ki धारा 8 के तहत हस्तांतरित होगी क्योंकि उसके परिवार में श्रेणी-एक की महिला वारिस भी मौजूद थीं।”
#6

             Supreme Court कोर्ट ने Hindu Succession Act 1956 कानून की धारा 30 का उल्लेख करते हुए कहा कि सहदायिता (संयुक्त अधिकार वाली) सम्पत्ति वसीयत के आधार पर बंटवारा किए जाने योग्य थी। “यह (धारा 30) स्पष्ट तौर पर बताती है कि जब तक सम्पत्ति का बंटवारा नहीं हो जाता या पारिवारिक इकरार (समझौता) नहीं हो जाता तब तक ‘टेनेंट्स-इन-कॉमन’ के तौर पर कानूनी वारिस होने के बावजूद यह सम्पत्ति संयुक्त परिवार की सम्पत्ति नहीं रह गयी थी।”
                 उक्त सम्पत्ति के संयुक्त परिवार की सम्पत्ति नहीं होने का परिणाम यह था कि नाबालिग की हिस्सेदारी छोड़ने के लिए मां द्वारा संरक्षक की भूमिका निभाने में कोई कानूनी बाधा नहीं थी। हिन्दू (Hindu) नाबालिग एवं संरक्षक अधिनियम की धारा छह के अनुसार, संयुक्त पारिवारिक सम्पत्ति में नाबालिग की अविभाजित हिस्सेदारी को लेकर नाबालिग का स्वाभाविक संरक्षक कुछ नहीं कर सकता। यदि सम्पत्ति संयुक्त परिवार की हो तो वह प्रतिबंध नहीं लागू होगा।
  #7              संयुक्त परिवार की सम्पत्ति में नाबालिग की हिस्सेदारी के लिए कर्ता संरक्षक की भूमिका नहीं निभा सकता वादी ने दलील दी थी कि संयुक्त परिवार की सम्पत्ति मामले में घर का बड़ा बेटा ‘कर्ता’ था और सम्पत्ति के मामले में स्वाभाविक संरक्षक की भूमिका ‘कर्ता’ को निभानी चाहिए थी, न कि मां को। कोर्ट ने कहा कि यद्यपि यह माना गया था कि उक्त सम्पत्ति संयुक्त परिवार की सम्पत्ति थी, लेकिन यह दलील कसौटी पर ठहरने योग्य नहीं थी। ऐसा हितों के टकराव की वजह से था, क्योंकि कर्ता नाबालिग के संरक्षक की भूमिका में आकर नाबालिग का हिस्सा अपने पक्ष में भी कर सकता है।
  #8                      “ जब इस प्रकार का बंटवारा होता है और कुछ सदस्य अपना हिस्सा कर्ता के लिए छोड़ देते हैं तो कर्ता उस नाबालिग के संरक्षक के तौर पर भूमिका नहीं निभा सकता, जिसका हिस्सा कर्ता के पक्ष् में छोड़ा जा रहा है। ऐसी स्थिति में यह हितों के टकराव की स्थिति होगी। ऐसे मौके पर मां ही स्वाभाविक संरक्षक होगी और इसलिए माँ द्वारा निष्पादिक दस्तावेज को अप्रभावी दस्तावेज नहीं कह सकते।”
#9

Supreme Court कोर्ट ने कहा कि:-
हिन्दू (Hindu) नाबालिग एवं संरक्षण अधिनियम की धारा आठ के तहत रिलीज डीड निष्प्रभावी दस्तावेज हो जाता यदि वादी के बालिग होने के तीन साल के भीतर चुनौती दी गयी होती। कोर्ट ने यह भी कहा कि 1973 में जब रिलीज डीड तैयार किया जा रहा था तो वादी 17 साल की थी, जबकि भाइयों के बीच बंटवारा 1980 में हुआ था, जिसमें वादी का पति खुद सत्यापन करने वाले गवाहों में शामिल था। यह मुदकमा नौ वर्ष बाद दायर किया गया था। इन परिस्थितियों के कारण भी कोर्ट ने वादी की याचिका खारिज कर दी थी। इन तथ्यों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने ट्रायल कोर्ट द्वारा मुकदमा निरस्त किये जाने का आदेश बहाल करने संबंधी अपील स्वीकार कर ली।

#10
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#12

सोमवार, 14 दिसंबर 2020

पति के निधन के बाद पति की संपत्ति में क्या होगा दूसरी पत्नी का हक?

 पति के निधन के बाद पति की संपत्ति में क्या होगा दूसरी पत्नी का हक?

  #1                                दूसरी कानूनी शादी के मामले में प्रॉपर्टी पर दूसरी पत्नी के बच्चे भी दावा कर सकते हैं। लेकिन अगर पति ने अपनी पहली पत्नी को तलाक नहीं दिया है या पत्नी जिंदा है और उसने दूसरी शादी कर ली तो वह अमान्य मानी जाएगी। दूसरी शादी से होने वाले बच्चों की देखभाल माता-पिता ही करेंगे, लेकिन वे पसंदीदा उत्तराधिकारी या सहदायिक नहीं होंगे। 

 



  #2

हालांकि सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने एक फैसले में कहा कि दूसरे विवाह से पैदा हुए बच्चे पिता की संपत्ति पर दावा कर सकते हैं। हालांकि शादी अमान्य हो सकती है, मगर बच्चों को नाजायज नहीं माना जाएगा। लेकिन अगर शादी पहली पत्नी के जिंदा रहते या बिना तलाक हुए हुई है तो दूसरी  पत्नी संपत्ति पर दावा नहीं कर सकती। 
  #3                पिछले साल दिए गए फैसले में पहली पत्नी के अधिकार बरकरार रखे गए। शीतलदीन (पति) को उनकी पहली पत्नी सुखराना बाई ने छोड़ दिया। इसके बाद उनसे विद्याधारी से शादी की, जिससे उन्हें 4 बच्चे हुए। शीतलदीन ने विद्याधारी को नॉमिनी बनाया हुआ था। साथ ही उनके रोजगार से होने वाला लाभ भी उन्हीं के लिए सुरक्षित रखा था। वह अपने चार बच्चों के लिए उत्तराधिकार प्रमाण पत्र का भी दावा कर सकती थी। लेकिन शीतलदीन के निधन के बाद दोनों पत्नियों ने उत्तराधिकार प्रमाणपत्र दायर कर दिया। ट्रायल कोर्ट ने जहां दूसरी पत्नी के हक में फैसला दिया। वहीं मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने पहली पत्नी का पक्ष लिया। 
  #4                         आगे अपील पर तय हुआ कि पहली पत्नी को संपत्ति में एक-पांचवा हिस्सा दिया जाएगा। चारों बच्चों को भी उनका वैध हिस्सा दिया गया। लेकिन दूसरी पत्नी को अपना हिस्सा छोड़ना पड़ा, क्योंकि कानून की नजर में सुखराना बाई वैध पत्नी थीं, जिन्होंने शीतलदीन ने दूसरी शादी करने से पहले तलाक नहीं दिया था। 

#5

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#6

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