गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

पैतृक संपत्ति में बेटियों को बराबर का हिस्सा / हिंदू उत्तराधिकार कानून 2005

  पैतृक संपत्ति में बेटियों को  बराबर का हिस्सा   / 
  हिंदू उत्तराधिकार कानून 2005
देश की तमाम महिलाएं  पिता, भाई या पति पर वित्तीय रूप से निर्भरता है. ,सालों से महिलाओं की मुश्किलों की जड़ रही है.
#1
इसी के मद्देनजर 2005 में हिंदू उत्तराधिकार कानून 1956 में संशोधन किया गया. इसके तहत पैतृक संपत्ति में बेटियों को बराबर का हिस्सा देने की बात कही गई है. बावजूद इसके क्या पिता बेटी को अपनी प्रॉपर्टी में हिस्सा देने से मना कर सकता है? आइए, देखते हैं इस सवाल का जवाब क्या है:

 
1. अगर पुरखों की है संपत्ति
हिंदू कानून के तहत प्रॉपर्टी दो तरह की हो सकती है. पैतृक और खुद खरीदी गई. पैतृक संपत्ति उसे कहते हैं जो पिछली चार पीढ़ियों से पुरुषों को मिलती आई है. इस दौरान इसका बंटवारा नहीं हुआ. बेटी हो या बेटा ऐसी प्रॉपर्टी पर दोनों का जन्म से बराबर अधिकार होता है. कानून कहता है कि पिता इस तरह की प्रॉपर्टी को अपने मन से किसी को नहीं दे सकता है. यानी इस मामले में वह किसी एक के नाम वसीयत नहीं कर सकता है. इसका मतलब यह है क‍ि वह बेटी को उसका हिस्सा देने से वंचित नहीं कर सकता है. जन्म से बेटी का पैतृक संपत्ति पर अधिकार होता है.
#2
#2. अगर पिता ने खुद खरीदी है प्रॉपर्टी
अगर पिता ने खुद प्रॉपर्टी खरीदी है यानी पिता ने प्लॉट या घर अपने पैसे से खरीदा है तो बेटी का पक्ष कमजोर होता है. इस मामले में पिता के पास प्रॉपर्टी को अपनी इच्छा से किसी को गिफ्ट करने का अधिकार होता है. बेटी इसमें आपत्ति नहीं कर सकती है.
#3
3. अगर बिना वसीयत पिता की मौत हो गई 
अगर पिता की मौत बिना वसीयत छोड़े हो गई तो सभी उत्तराधिकारियों का प्रॉपर्टी पर बराबर अधिकार होगा. हिंदू उत्तराधिकार कानून में पुरुष उत्तराधिकारियों को चार वर्गों में बांटा गया है. इसमें सबसे पहले प्रॉपर्टी क्लास-एक के उत्तराधिकारियों के पास जाती है. इनमें विधवा, बेटी और बेटे या अन्य शामिल हैं. प्रत्येक उत्तराधिकारी प्रॉपर्टी का एक हिस्सा लेने का हकदार है. इसका मतलब यह है कि पिता की प्रॉपर्टी में बेटी का बराबर हिस्सा है. 
#4. अगर शादीशुदा है बेटी 
2005 से पहले हिंदू उत्तराधिकार कानून बेटियों को हिंदू अविभाजित परिवार  के सदस्य के तौर पर देखता रहा है. हालांकि, शादी के बाद वे HUF का हिस्सा नहीं रह जाती थीं. 2005 के संशोधन के बाद वैवाहिक दर्जे से पिता की प्रॉपर्टी पर अधिकार का लेना-देना नहीं रह गया है. 
#5
5. अगर बेटी का जन्म या पिता की मौत 2005 से पहले हुई 
इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि बेटी का जन्म 9 सितंबर 2005 के बाद हुआ या उसके पहले. पिता की प्रॉपर्टी में बेटी का बेटे जितना अधिकार होगा. फिर चाहे पैतृक संपत्ति हो या सेल्फ ऑक्यूपाइड.  सेल्फ-ऑक्यूपाइड प्रॉपर्टी को पिता की वसीयत के अनुसार बांटा जाएगा. 

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#6

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कानूनी उत्तराधिकारी / कानूनी वारिस प्रमाणपत्र कैसे बनता है/Legal heir certificate कैसे बनायें

Legal heir certificate    कैसे बनायें
 कानूनी उत्तराधिकारी certificate 
 Legal heir certificate कैसे बनायें
#1
           जब परिवार का मुख्य सदस्य या अन्य किसी सदस्य का निधन हो जाता हैं,तो उसके वारिस Legal heir certificate के लिए apply कर सकते हैं।
 

Legal heir certificate मृतक और परिवार के अन्य सदस्यों के बीच क्या संबंध थे, को बताने का एक महत्वपूर्ण कानूनी दस्तावेज है।
#2
Legal heir certificate क्यों ज़रूरी हैं
Telephone, Electricity connection transfer करने के लिए
🌿House tax करने के लिए
🌿Patta transfer करने के लिए
🌿Bank account transfer करने के लिए
🌿Insurance claim करने के लिए
यदि मृतक central या state govt. में  सरकारी नौकरी में है तो
#3
Legal heir certificate क्यों ज़रूरी हैं
🌿family pension,
Salary arrear
🌿Provident fund
🌿Gratuity
🌿Retire benefits
🌿Service benefits
में claim के लिए मृतक के साथ संबंध/relation को कानूनी तौर पर बताने के लिए।
🌿compassionate appointment यानी अनुकंपा में नौकरी पाने के लिए
#4
Legal heir certificate क्यों ज़रूरी हैं
लेकिन,यह certificate जहां बिना वसीयत बनाये किसी की मृत्यु होने पर property transfer में वैध नहीं है।
साथ ही, financial institution के साथ लेने देन में भी यह वैध नहीं हैं। इन मामलों में succession certificate जो civil court से issue होता हैं,की जरूरत होती हैं।
#5
 Legal heir certificate क्यों ज़रूरी हैं
जिन documents की ज़रूरत होगी
👉  Death certificate
👉 identity/address proof मृतक  और आवेदक का, जैसे-आधार कार्ड, Driving licence, passport इत्यादि
👉  Ration card
👉  UID or आधार
👉  Signed Application form
👉  Self Declaration or affidavit
👉 Service certificate, यदि मृतक central or state govt. में नौकरी करता था
👉 Pension payment slip, यदि मृतक pension लेता हो,
#6
कौन legal heir certificate बनवा सकता हैं
💏मृतक का पत्नी या पति
👫बेटा या बेटी
🧖‍♀️माता
#7
Process
Legal heir certificate बनवाना बिल्कुल आसान है। Application के साथ सभी documents लगाकर अपने क्षेत्र में पड़ने वाले तालुक या तहसील या नगरपालिका में जमा करना होता हैं।
Application में सभी कानूनी वारिसों ,उनके साथ मृतक का संबंध ,सभी सदस्यों का नाम और पता लिखा होना चाहिए। और आवेदन में आवेदक का नीचे तिथि सहित हस्ताक्षर होना चाहिए।
इसके बाद आपके  application की जांच होती है। ग्राम या वार्ड लेवल के पदाधिकारी इसपर अपनी जांच रिपोर्ट देते हैं। इसका सत्यापन revenue inspector करते है।
जांच रिपोर्ट से संतुष्ट होकर legal heir certificate issue कर दिया जाता है।
इस Legal heir certificate में सभी वैध वारिसों का नाम लिखा रहता है।
#8

Legal heir certificate, succession certificate से अलग है
 

कई लोग legal heir certificate और succession certificate को एक मानते है।
🌿Succession certificate civil court से बनता है,और इसे बनाने का अलग procedure है।
🌿Legal heir certificate के लिए बेटा/बेटी या 
पती/पत्नी या मृतक के अभिभावक apply कर सकते है।
जबकि succession certificate केवल मृतक के कानूनी वारिस ही apply कर सकते है।
🌿Legal heir certificate बनने में लगभग 1 माह का समय लगता है,
जबकि succession certificate बनाने में 6 से 7 माह का समय लग सकता है।
🌿Legal heir certificate के application को challenge नहीं किया जा सकता,
जबकि succession certificate के application को 45 दिनों के अंदर challenge किया जा सकता है।
🌿Legal heir certificate को केवल छोटे छोटे कामों में ही use किया जा सकता हैं,जैसे insurance claim, vehicle ownership transfer ,
जबकि succession certificate property transfer या possession transfer करने में, मृतक के जगह debt या security के payment में या payment लेने में काम आता है।
🌿Legal heir certificate, भारतीय उत्तराधिकार कानून में उत्तराधिकारी  होने का प्रमाण नहीं है।
विवाद में succession certificate ज़रूरी है।

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गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

(प्रोब्इट/प्रोबेट) in Hindi / प्रोब्इट/प्रोबेट का हिंदी में मतलब:

Meaning of Probate (प्रोब्इट/प्रोबेट) in Hindi / प्रोब्इट/प्रोबेट का हिंदी में मतलब:
निम्नलिखित हिंदी में प्रोब्इट/प्रोबेट शब्द के अर्थ की पूरी सूची है: #1

  • प्रोबेट या अदालत की अदालत से या उससे संबंधित; के रूप में, एक प्रोबेट रिकॉर्ड

  • अपने सजा को निलंबित करके एक दोषी व्यक्ति को परिवीक्षा पर रखो

  • प्रमाण

  • एक न्यायिक प्रमाण पत्र कह रहा है कि एक वास्तविक और निष्पादक को संपदा का प्रशासन करने की शक्ति प्रदान करेगा

  • वसीयत को साबित करने का अधिकार या अधिकार क्षेत्र

  • यह साबित करने का कार्य है कि एक वसीयत के प्रावधान के एक साधन पर हस्ताक्षर किए गए और कानूनी आवश्यकताओं के अनुसार उसे निष्पादित किया गया

  • आधिकारिक प्रमाण; विशेष रूप से, एक सक्षम अधिकारी या न्यायाधिकरण से पहले एक सबूत जो एक उपकरण की पेशकश की गई थी, अंतिम मृतक और मृत्यु के एक व्यक्ति की मृत्यु का बयान, वास्तव में उसकी वैध कार्य है; एक की प्रतिलिपि साबित हुई, प्रोबेट कोर्ट की मुहर के तहत, निष्पादक को उसके प्रमाण पत्र के साथ वितरित किया गया.

  • #2
  • प्रमाणित इच्छापत्र

  • आधिकारिक अनुमोदन प्राप्त करने के लिए, अंतिम साधन और वसीयतनामा होने के लिए एक साधन के रूप में; के रूप में, निष्पादक ने इच्छा की जांच की है

  • परिवीक्षा करना

  • कानूनी मान्यताओं की स्थापना (विल्स और अन्य दस्तावेजों)

  • संप्रमाणित करना

#3


Meaning of Probate (प्रोब्इट/प्रोबेट) in English / प्रोब्इट/प्रोबेट का अंग्रेज़ी में मतलब:

निम्नलिखित अंग्रेज़ी में प्रोब्इट/प्रोबेट शब्द के अर्थ की पूरी सूची है:

गुजारा भत्ता किस दिन से लागू होगा आदेश वाले दिन से या अर्जी दाखिल करने वाले दिन से- हाई कोर्ट ||

गुजारा भत्ता किस दिन से लागू होगा आदेश वाले दिन से या अर्जी दाखिल करने वाले दिन से- हाई कोर्ट || 

#1

                           In the case of Vikas Bhushan versus State and others of the Delhi High Court, decide From which day will maintenance be given, it is believed that there is no donation or reward given to the wife. This amount has been given for its survival or survival. The bench of Justice Sanjeev Sachdev was considering the question in this matter, which it was asked that the amount of the allowance should be given from the date on which the application has been filed or on which day the order for giving alimony is given, From that date Responding to this question, the court, in response to the question of “maintenance allowance or maintenance” provision made for women, said that-

                 “The purpose of maintenance or alimony is to carry the maintenance allowance of the wife, which is not able to bear the expenses of herself, so the amount of allowance should normally be given the date of the payment. If the court wishes to give the amount of allowance to the date of its order, then the circumstances of the court must be compelled to adopt such an idea. “

#2

The court also said that-

There is no donation or reward for livelihood given to the wife. It is given so that he can live her life. In the case of filing an application from the court, the time passed between the order of the allowance for the allowances, but that does not mean that he has enough funds or money to make his living. “

The petitioner husband challenged the order of the lower court in this case. The lower court had directed the petitioner’s husband in his order to give his wife an interim allowance of Rs 40000. In this case, the woman filed an application under Section 12 of the Women’s Protection Act 2005 from domestic violence.

#3

           The petitioner’s lawyer argued before the court that the lower court did not consider that the defendant’s wife had already filed an application under section 125 of the Criminal Procedure and an order to give 15,000 rupees as interim allowance is. The petitioner has been giving that amount every month.

#4

However, the court was informed that the application filed under section 125 of the CRPC has been withdrawn.

                 The petitioner’s lawyer also argued that the lower court has asked the order to grant alimony from the date of filing of the appeal, while the alimony was not asked to be given from the date on which the order was given to do so Was there. By doing so, the lower court has made a mistake. Since the defendant wife was already getting Rs 15000 per month subsidy under Section 125 of the CRPC. He also said that while fixing the amount of livelihood allowance, ignored the facts of the case.

The court rejected the arguments saying,

“When the lower court reaches the conclusion after hearing the case that if the wife is entitled to maintenance or maintenance, then the assessment is actually related to the date of application. If the appraisal is related to the date of application, then there must be compelling conditions to pay alimony from the period after the date of the court order. “

#5

The court cited the judgment given by the Supreme Court in the case of Jayimaniben Hirenai Vyas and others vs. Hiranbhai Ramesh Chandra Vyas and others (2015) 2 SCC 385, this decision was also related to a similar issue. Apart from this, the High Court also referred to the decision made by Line Sabharwal and others vs. Jitendra Sabharwal 2018 SCCC on line 12448, CRL.mc3647 / 2014. In this decision, the court had admitted that the amount of alimony is related to the date of filing the application, and not from the date of the order.

#6

The court said that

                     it is clear that the amount of livelihood allowance is from the date of filing application or it should be given from the date and no challenge has been given to the amount of allowance paid by the trial court. Therefore, the court is rejecting the petition filed in this case. Along with this, the petitioner is directing that the date of filing of the application from March 2014 will be given to his wife as a allowance of 40000 rupees. However, under the order given under section 125 of the CrPC, the amount which he has already given before, can reduce that amount from this amount.

#7

READ MORE----

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